आज़ादी, समानता, मानवाधिकार, लैंगिक, सामाजिक, और आर्थिक बराबरी के सिद्धांतों को अपने में समेटे हुए जब लेनिनवाद रूस से चलकर चीन के रास्ते माओवाद को अपने साथ लेकर पूरी दुनिया के समक्ष प्रस्तुत हुआ तब दुनिया अमेरिका के पूंजीवाद और यूरोप के सामंतवाद को पीछे धकेलकर वामपंथ को अपने आगोश में ले लिया।

 

1947 में जब देश आज़ाद हुआ तब नेहरु के पास दो रास्ते थे, पहला या तो वह देश को पूंजीवाद के रस्ते ले जाकर अमेरिका के करीब पहुँच जाता या फिर वामपंथ को अपनाकर रूस के करीब, उन्होंने दूसरा विकल्प चुना। 33 करोड़ की आबादी वाला देश जहाँ भुखमरी से लोग मर रहे थे और सुविधाएं चंद जमींदारों और धनाड्यों के पास सीमित था। वहां पर जब समाज में समानता की बात कही गयी तो इस विचारधारा को लोगो ने गले से लगा लिया। 1960 और 1970 के दशक में युवाओं में बहुत क्रेज हुआ करता था खुद को कामरेड कहलाने का।

 

आज़ादी के बाद वामपंथियों का सबसे बड़ा केंद्र बना पश्चिम बंगाल। उस वक़्त आर्थिक रूप से बंगाल दो टुकडो में विभाजित था। 1950, 60 और 70 के दशक में भारत की आर्थिक राजधानी कोलकाता को माना जाता था। यहाँ तक की 18वीं शताब्दी और 19वीं शताब्दी के मध्य तक कोलकाता एशिया का सबसे बड़ा आर्थिक केंद्र था। 1949 में पीपल रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के स्थापना के बाद शंघाई का विकास हुआ और कोलकाता पिछड़ गया लेकिन फिर भी यह देश भर के युवाओ को अपनी ओर आकर्षित करता था। एक तरफ जहाँ उन्नति और विकास था दूसरी तरफ कोलकाता से 50 किमी बाहर पैर रखते ही अकाल और गरीबी का जंगलराज शुरू होता था। खाने को रोटी नहीं और बदन ढकने को तन पर कपडा नहीं। आज भी बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रो की हालात यह है कि लोगो को पेट भरने के लिए धान की कुटाई करने के बाद जो चावल के टुकड़े बचते है उन्हें उबालकर जो झांग निकलता है उसे पीकर पेट भरते है।

 

अंग्रेजो के देश छोड़ने के बाद देश की कमान भले ही दिल्ली को मिल गया लेकिन सामाजिक कमान रजवाड़े और जमींदारों के ही पास था जो की शोषण, अत्याचार, बलात्कार और अन्य सभी प्रकार के यातनाओं का प्रयोग अपने सामाजिक रुतबे को बनाये रखने के लिए करते थे। समाज की इसी विषमता के बीच पश्चिम बंगाल वामपंथ का प्रयोगशाला बना जो उन गरीबों को सपने दिखा रहा था की वह कोलकाता की बराबरी कर सकता है। हालाँकि इस विचारधारा में कोई बुराई नहीं है लेकिन इसे धरातल पर अमल करने का तरीका गलत है।

 

वामपंथ कभी यह नहीं सिखाएगा  की कैसे स्वरोजगार पैदा करें? हाँ यह जरूर सीखा देगा कि जो रोजगार दे रहा है उसकी बरबरी करने के लिए उसके रोजगार को ही बंद कैसे कर दे? जो पश्चिम बंगाल एक वक़्त पर भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती थी, उस पश्चिम बंगाल के उद्योग पर ताला लगाने और निवेशकों को वहां से भागने का श्रेय भी वामपंथियों को ही जाता है।

 

यूँ तो वामपंथी विचारधारा महिला अधिकारों की बराबरी की बात करता है, लेकिन इनके लिए महिला अधिकार फ्री सेक्स तक ही सिमित हो जाता है। एक महिला जितने अधिक पुरुषों के साथ हमबिस्तर हो लेगी वो उतनी ही ज्यादा आधुनिक कहलाएगी। इनके थ्योरी में महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ, और शोषण का कोई जिक्र नहीं। यदि महिला फ्री सेक्स करने के लिए सक्षम है तो वो स्वावलंबी मानी जाएगी। इस देश में आज भी 70% महिलाएं घरेलु हिंसा से पीढित है, 35% महिलाएं आज भी प्राइमरी एजुकेशन पूरा नहीं कर पाती और हर चौथी महिला शारीरिक शोषण का शिकार होती है। पर कभी किसी ने इन्हें इन मुद्दो पर बात करते हुए नहीं सुना होगा।

 

इन्होने आदिवासियों और पिछडो की समस्याओं को सुलझाने के लिए आदिवासियों को बन्दूक पकड़ाकर नक्सलवाद के रास्ते तो धकेल दिया पर कभी उन आदिवासियों को उनके योग्यता के अनुसार उनके कौशल का विकास करके समाज में अग्रणी स्थान पर लाने का प्रयास नहीं किया।

 

वर्त्तमान परिदृश्य में भी वामपंथ का दोगला चरित्र खुल कर सामने आया है। यदि वामपंथ यह मानता है कि देश में सभी धर्मं, संप्रदाय, और जातियों में समानता होनी चाहिए तो फिर उनके हक की लडाई भी सामान रूप से लड़नी पड़ेगी। हाल ही के दिनों में देश में कई घटनाएं हुई जैसे कि हैदराबाद में रोहित वेमुला के आत्महत्या पर वामपंथियों ने देशव्यापी आन्दोलन किया क्यूंकि उन्हें बीजेपी को इस मुद्दे पर घेरना था लेकिन 7 जुलाई को दिल्ली में रिया नाम की एक दलित युवती की हत्या आदिल नाम के प्रेमी ने कर दिया पर उसका कोई जिक्र वामपंथियों ने नहीं किया क्यूंकि दलित और मुस्लिम दोनों इनके लिए वोट बैंक है।

 

देश में जब कोई आतंकी मारा जाता है तो उसका विलाप वामपंथियों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक वर्ष 9 फरवरी को आतंकी अफज़ल गुरु की बरसी मनाई जाती है वहीँ जब छत्तीसगढ़  में नक्सली हमलों में 76 CRPF के जवान मारे गए तो वामियो ने उसका जश्न JNU में मनाया। वामपंथियों की माने तो माँ दुर्गा ने महिषासुर को यौन आकर्षित की थी और फिर छल से उसे मार गिराया था। वामपंथी महिषासुर को दलित और माँ दुर्गा को ब्राम्हण मानते है और दशहरे पर महिषासुर की पूजा करते है। पुरानो के अनुसार जब ब्रम्हा जब सृष्टि की रचना कर रहे थे तब वह संसार में अकेले बचे थे तो सृष्टि को आगे बढ़ने के लिए उन्होंने माँ सरस्वती को अपने मुख से उत्पन्न किया और बाद में उनसे विवाह करके प्रथम मानव मनु को जन्म दिया। लेकिन वामपंथी ब्रम्हा को अपने पुत्री के साथ विवाह और सेक्स करने वाले दुराचारी मानते है।

 

जब अखलाख की मौत होती है, जब जुनैद की मौत होती है तो वामपंथी बिरादरी घर से बाहर निकलकर अवार्ड वापस करने लगती है लेकिन जब बिसरहाट में ३ दिन तक पूरे गाँव को मुसलमानों द्वारा जलाया जाता है, हिन्दुओं को काटा जाता है, पश्चिम बंगाल में दुर्गा प्रतिमा तोड़ी जाती है, मालदा में हिन्दू घरों को आग लगायी जाती है और कर्नाटक में दलित गौरक्षक की हत्या की जाती है तब इन लोगो के मुह पर ताला लग जाता है।

 

यह दोगला बिरादरी तो जन्म देने वाली अपने मातृभूमि की सगी नहीं है तो देशवासियों की क्या सगी होगी? इसलिए घर में सांप पाल लो पर वामपंथियों से दोस्ती कभी न करो।

 

 

 

 

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